नारी विमर्श पर दोहे-
नारी विमर्श पर दोहे-
प्राणप्रिया की ताड़ना , ऐसा करे विकास ।
हुए अज्ञ से विज्ञ फिर,कविवर तुलसी दास ।।-1
मैं कमला, मैं कालिका, मैं वामा घर द्वार ।
मानव रखना ध्यान मैं, दो धारी तलवार ।।-2
युग निर्माता मानवी, आँगन की मुस्कान ।
छीना आज दहेज ने, नारी का सम्मान ।।-3
दुल्हन बनकर एक दिन,रही पिया के साथ ।
सुबह सिपाही बन गए , मेंहदी वाले हाथ ।।-4
बुलबुल विधवा हो गई, गोदी बच्चे चार ।
मेहनत,साहस,धैर्य से,पाल रही परिवार ।।-5
बिन गृहणी घर जेल सा , बुरे रहें हालात ।
जहाँ मात रे शक्ति है, वहाँ स्वर्ग दिन-रात ।।-6
छेड़-छाड़ का रेप का,यह भी कारण मान ।
खुला निमंत्रण बाँटते, नारी के परिधान ।।-7
पछुआ से ढीले पड़े, लाज - शर्म के पेच ।
विज्ञापन में मानवी, अदब रही है बेच ।।-8
✍ शिव कुमार दीपक
बहरदोई,सादाबाद
हाथरस (उ० प्र०)
प्राणप्रिया की ताड़ना , ऐसा करे विकास ।
हुए अज्ञ से विज्ञ फिर,कविवर तुलसी दास ।।-1
मैं कमला, मैं कालिका, मैं वामा घर द्वार ।
मानव रखना ध्यान मैं, दो धारी तलवार ।।-2
युग निर्माता मानवी, आँगन की मुस्कान ।
छीना आज दहेज ने, नारी का सम्मान ।।-3
दुल्हन बनकर एक दिन,रही पिया के साथ ।
सुबह सिपाही बन गए , मेंहदी वाले हाथ ।।-4
बुलबुल विधवा हो गई, गोदी बच्चे चार ।
मेहनत,साहस,धैर्य से,पाल रही परिवार ।।-5
बिन गृहणी घर जेल सा , बुरे रहें हालात ।
जहाँ मात रे शक्ति है, वहाँ स्वर्ग दिन-रात ।।-6
छेड़-छाड़ का रेप का,यह भी कारण मान ।
खुला निमंत्रण बाँटते, नारी के परिधान ।।-7
पछुआ से ढीले पड़े, लाज - शर्म के पेच ।
विज्ञापन में मानवी, अदब रही है बेच ।।-8
✍ शिव कुमार दीपक
बहरदोई,सादाबाद
हाथरस (उ० प्र०)
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