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Showing posts from January, 2020

गाफिल स्वामी की कुंडलिया

कुण्डलिया-                                 ✍   गाफिल स्वामी                   1 बना  बड़ा है कर्म  से, हर कोई इंसान । बिना कर्म मिलता नहीं, धन शौहरत सम्मान ।। धन शौहरत सम्मान, कर्म से सबको मिलता । कर्म प्रगति की बेलि, कर्म से जीवन चलता ।। 'गाफिल' ये  संसार, कर्म से  तना खड़ा है । बिना  कर्म इंसान, न  कोई बना बड़ा है ।।       *****             ***** *****                       2 पहनावे  से धर्म की, होती  अब पहचान । लेकिन  मूरख भूल  मत, पहले तू  इंसान ।। पहले  तू इंसान, रंग  गोरा या काला । खून सभी का लाल, पादरी पंडित लाला ।। गाफिल कहता सत्य, धर्म मन को भरमावे । बन सच्चा इंसान, पहन  कुछ ...

शिव कुमार दीपक के दोहे

दोहे -                           ✍  शिव कुमार 'दीपक' रिश्ते अब  रिसते हुए , कलयुग  का उपहार । 'प्रेम सदन' घर पर लिखा, उसमें नित तकरार ।।-1 झूठ नही वह बोलता, जिसमें बसा कबीर । चाहे रख दो कण्ठ पर , चाकू या शमशीर ।।-2 लेकर खुशियां साथ में, आया बिना लिबास । सिर्फ कफ़न के वास्ते , इतना  बड़ा प्रयास ।।-3 यंग  इंडिया  धन्य है ,  कैसा तेरा प्यार  ? अब बूढ़े माँ-बाप को, समझे सिर का भार ।।-4 कहते भ्रष्टाचार पर, किया करारा वार । दूनी  रिश्वत  माँगता,---बाबू , थानेदार ।।-5 मस्त पवन की चाल पर,-- नाचें मन में मोर । मतवाली ये खिड़कियां, झाँकें उसकी ओर ।।-6 मुखिया के घर आ रहा,जब से थानेदार । तब से झगड़े बढ़ गए ,बढ़ी रार-तकरार ।।-7 लटकाये हैं  कंठ में, राम  और हनुमान । चाल-चलन से दिख रहे,रावण की संतान ।।-8 जग में मानव के मिले, हमको कई प्रकार । कोई  नफरत बाँटता, को...

अहिल्याबाई की आरती

       अहिल्याबाई की आरती जय अहिल्या बाई ! माँ,जय अहिल्या बाई !! दया  धर्म की  मूरत , शिव की  अनुयायी ।।जय---- जन्म मानको के घर, चौंडी में पाया । ससुर मल्हार होल्कर,पति खंडे राया ।।जय----1 सहे  निजी जीवन  में , तुमने दुख भारी । बनीं लोक माता तुम, जन-जन दुख हारी ।।जय---2 तीस वर्ष मालव पर , तुमने राज किया । हर प्राणी संरक्षित, सुख के साथ जिया ।।जय----3 तुमने  राघोवा के , दर्प  हरे सारे । समर भूमि में तुमसे ,चन्द्रावत हारे ।।जय---4 हत्या लूट जहाँ थी , पेशे गत  जारी । वश में किये शक्ति से,तुमने पिंडारी ।।जय----5 मुख पर दिव्य अलौकिक,शोभा कल्याणी । धनगर वंश शिरोमणि , जनप्रिय महारानी ।।जय---6 यश-प्रताप परहित का,जब जग में छाया । महा विरुद जीते जी , ”पुण्यश्लोक”पाया ।।जय----7 ग्रंथ कार  करते हैं , शब्दों  से पूजा । प्रजा परायण तुम-सा, हुआ नहीं दूजा।।जय----8 तुम-सा शासक कोई , भारत फिर पावे । रोज़ी-रोटी छत  हो , मन का डर ,जावे ।।जय---9 माँ तेरी  यश ...