शिव कुमार दीपक के दोहे
दोहे -
✍ शिव कुमार 'दीपक'
रिश्ते अब रिसते हुए , कलयुग का उपहार ।
'प्रेम सदन' घर पर लिखा, उसमें नित तकरार ।।-1
झूठ नही वह बोलता, जिसमें बसा कबीर ।
चाहे रख दो कण्ठ पर , चाकू या शमशीर ।।-2
लेकर खुशियां साथ में, आया बिना लिबास ।
सिर्फ कफ़न के वास्ते , इतना बड़ा प्रयास ।।-3
यंग इंडिया धन्य है , कैसा तेरा प्यार ?
अब बूढ़े माँ-बाप को, समझे सिर का भार ।।-4
कहते भ्रष्टाचार पर, किया करारा वार ।
दूनी रिश्वत माँगता,---बाबू , थानेदार ।।-5
मस्त पवन की चाल पर,-- नाचें मन में मोर ।
मतवाली ये खिड़कियां, झाँकें उसकी ओर ।।-6
मुखिया के घर आ रहा,जब से थानेदार ।
तब से झगड़े बढ़ गए ,बढ़ी रार-तकरार ।।-7
लटकाये हैं कंठ में, राम और हनुमान ।
चाल-चलन से दिख रहे,रावण की संतान ।।-8
जग में मानव के मिले, हमको कई प्रकार ।
कोई नफरत बाँटता, कोई करता प्यार ।।-9
आने-जाने में सदा , रखें स्वयं का ध्यान ।
समय खड़ा है सामने , छुरी तमंचा तान ।।-10
उसकी सारी झोलियाँ , भरता है भगवान ।
खुश होकर जो बाँटता, प्यार,ज्ञान,सम्मान ।।-11
मापा सागर आपने , और भूमि का भार ।
नाप सके कब भूख का, कितना है आकार ??-12
अल्लाह हु अकबर कहें,या फिर जय श्री राम ।
उन्मादी इस भीड़ में , नफरत भरी तमाम ।।-13
जड़ें स्वर्ण के फ्रेम में, या करदें दो टूक ।
दर्पण सच ही बोलता,कभी न रहता मूक ।।-14
क्यों दबंग तू बन रहा, ले टीला की आड़ ।
'माँझी' बन हम तोड़ते,मद से खड़े पहाड़ ।।-15
हरी चादरें मखमली , दिनभर चढ़ीं मज़ार ।
ठिठुर-ठिठुर बुढ़िया मरी,उसी पीर के द्वार ।।-16
जब तक टुकड़ा काँच का,तन मन चुभती कोर ।
दर्पण बनते, देखती , दुनिया उसकी ओर ।।-17
'होरी' के बल का नही ,पण्डित तुझको ज्ञान ।
उसके छूने मात्र से , दूषित हो भगवान ।।-18
सामाजिक सद्भाव की ,जीवित एक नजीर ।
अली बनाये प्रेम से , कान्हा की तश्वीर ।।-19
राजनीति ने रच दिया , ऐसा दुष्कर जाल ।
जो भी मुर्गा बांग दे , उसका होय हलाल ।।-20
पूछा प्रश्न कुमार ने , रहे खड़े सब मौन ।
बस इतना समझाइये , माँ से बढ़कर कौन ? -21
जननी करती उम्र भर , जीवन पथ आलोक ।
माँ के आगे क्षुद्र हैं , धरा, गगन, सुरलोक ।।-22
दरबारी जो लेखनी, कब लिख पाये पीर ।
सच्चाई का सारथी , भूखा रहे कबीर ।।-23
कर्म सँभलकर कीजिये , राजा हो या रंक ।
चाय चरित यदि गिर गए, दाग दार हो अंक ।।-24
✍ शिव कुमार 'दीपक'
सादाबाद(हाथरस)
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