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Showing posts from November, 2019
शिव कुमार 'दीपक' की कुंडलिया माखन के वे दिन कहां, कहां नंद के लाल ।  मोबाइल  के लालची, आज बाल गोपाल ।‌‌।             आज बाल गोपाल, दही माखन  को भूले ।      मोबाइल में गेम, गीत  सुन सुनकर फूले ।।           गुटका पान पराग, शौक उनके बचपन के ।                  'दीपक'आते याद,दिवस मिश्री माखन के ।। -1 'होरी' आया शहर में, हुआ गांव  से तंग ।                काम कोठियों में मिला, पोत रहा है रंग ।।           पोत रहा  है रंग, साथ  बेटा गोबर है ।                     सोने को फुटपाथ, ओढ़ने को चादर है ।।      ...