शिव कुमार 'दीपक' की कुंडलिया माखन के वे दिन कहां, कहां नंद के लाल । मोबाइल के लालची, आज बाल गोपाल ।। आज बाल गोपाल, दही माखन को भूले । मोबाइल में गेम, गीत सुन सुनकर फूले ।। गुटका पान पराग, शौक उनके बचपन के । 'दीपक'आते याद,दिवस मिश्री माखन के ।। -1 'होरी' आया शहर में, हुआ गांव से तंग । काम कोठियों में मिला, पोत रहा है रंग ।। पोत रहा है रंग, साथ बेटा गोबर है । सोने को फुटपाथ, ओढ़ने को चादर है ।। ...
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